Friday, February 28, 2020

संध्या सौंदर्य

सहसा ही तंद्रा जब टूटी,
लगा सांझ होने वाली;
दूर क्षितिज के पार डूबती
सूरज की रक्तिम लाली।

सांझ आरती घर में गूंजे,
तुलसी होती ज्योतिर्मय;
पंछी लौटे दाना लेकर,
आश्रित होते मोदमयी;
चूल्हे की कालिमा झरती
हाथ सजे काजलवाली;
सहसा ही तंद्रा जब टूटी,
लगा सांझ होने वाली;

व्योम पिछौरी पर है बिखरे,
झिलमिल जुगनू झुंड कई;
इक छोटा सा गोल रोटला
झांके उनके मध्य वहीं ;
रवि रूप को पाश में भरती
श्याम रैन, बनकर व्याली;
सहसा ही तंद्रा जब टूटी,
लगा सांझ होने वाली;

पंख लगाये स्वर्णिम सपनें,
देते है कुछ आस नई;
नैन पटल में विचरे ऐसे,
रैन बसेरे बसे यही;
शीत पवन में महके बेला,
झींगुर वाणी मतवाली;
सहसा ही तंद्रा जब टूटी,
लगा सांझ होने वाली

-निधि सहगल











Wednesday, February 26, 2020

नवगीत

टूटे पंखों से लिख दूँ मैं
बना लेखनी वो कविता
इन्द्रपर्णी वर्णों से उकेरूँ
कोरे पत्रों पर जीविता,

प्रणय गीत के रंग सजाकर
प्रेम सुधा रस बरसाऊं
विरह वेदना स्वर से फिर मैं
प्रेम अग्न विषाद बढ़ाऊ

शौर्य तेज की लौ जब चमके,
बनती शब्दों की सविता
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं
बना लेखनी वो कविता

करुणा का जब भाव बहे तो
मीरा के पद मैं छेड़ूँ
नयन नीर की गलियाँ फिर मैं
हास की स्वर्णा से जोडूं

वर्णो की महारास रचाकर
मधुरमयी गाऊँ निविता
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं
बना लेखनी वो कविता

बने प्रेरणा जीवन की जो
ऐसे बीजांकुर बोऊँ
गौरवमयी संगीत ताल पर
वर्ण के नर्तन में खोऊँ

बांधू  नूपुर स्याह कलम को
दिखलाऊँ कविमय दिविता
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं
बना लेखनी वो कविता

-निधि सहगल



Wednesday, February 12, 2020

क्या तुम साथ निभा पाओगे!

जीवन चक्र के घोर थपेड़े,
बिखरा देंगे रूप सुनहरे,
भीड़ में खड़ी जो कभी अकेली,
तुम्हें पुकारूँ , प्रियतम मेरे,
क्या उस क्षण भी इस क्षण भांति,
हाथ थाम कर मेरा प्रियवर,.         
मेरे मनमीत कहलाओगे!              
क्या तुम साथ निभा पाओगे!
                    हो विरोध के बादल छाए,
                    आकर मेरे अस्तित्व से टकरायें,
                    छिन्न भिन्न कर मेरे मन को,
                     अपने समक्ष मुझे झुकायें,
                     क्या उस क्षण भी इस क्षण भांति,
                      ढाल बनकर मेरे प्रियवर,
                      मेरे गौरव कहलाओगे!
                      क्या तुम साथ निभा पाओगे!
मिट जाए जो सुख की लकीरें,
दुख आकर द्वार पर चीखे,
जिस दिशा देखूं, हो विचलित,
रूठ जाए कर्म के लेखे जोखे,
क्या उस क्षण भी इस क्षण भांति,
ईश बनकर,मेरे प्रियवर,
मेरे धीरज कहलाओगे!
क्या तुम साथ निभा पाओगे !

-निधि सहगल


छत की मुँडेर

मेरी छत की मुंडेर, चिड़ियों की वो टेर, इन वातानुकूलित डिब्बों में खो गई, बचपन के क़िस्सों संग अकेली ही सो गई, होली के बिखरे रंग फीके हैं पड़ गए...