Friday, October 4, 2019

मखौटा

परत दर परत सजे हैं मखौटे,
सिलसिलों के मुताबिक़ बने है मखौटे।

कभी तो आँसुओ से भीगे मखौटे,
कभी खिलखलती हँसी हैं मखौटे,
कभी बेअदब सी जवानी मखौटे,
कभी घूंघट की निशानी मखौटे,
गली कूचों की कहानी मखौटे,
मखौटे पहन मखौटे गिराते मखौटे,

पीढ़ियों की सीढ़ियां चढ़ते मखौटे,
जन्म से मृत्यु तक का सफर है मखौटे,
अजन्मे, अनंत, अद्धभुत हैं यह मखौटे,
किन्तु उसके दर पर न चलते मखौटे,
दुनियादारी की भीड़ का हिस्सा मखौटे,
भीड़ से बने भीड़ में गुम हो जाते मखौटे।

-निधि सहगल

Thursday, October 3, 2019

जागो कवि



वो क्षणिका ,वो छंद,
वो प्रेरक प्रसंग,
वो दोहों की लड़ियाँ,
वो काव्य की कड़ियाँ,
वो जोश से भरी हुंकारों की ललकारें
जो स्याही में सज कर देतीं थी पुकारें
वो दिनकर का कुरुक्षेत्र,
महादेवी की यामा,
वो मैथिली की यशोधरा,
बच्चन की मधुशाला,
वो जो देश के लहु में बसता है,
ज्ञान का सागर,
वो जो हिन्द की पहचान है,
हिन्दी की गागर,
वो जो आत्म को परमात्म की शक्ति से मिलाता,
वो जो बंजर ह्रदय में प्रेम रस जगाता,
वो जो सरहद के रक्षक का आत्म बल है बनता,
वो जो कहकहों व ठहाकों की चादर है बुनता,
वो असीम शक्तिशाली कवि और काव्य कहाँ है?
क्यों सुप्त है ?कहाँ उसकी कलम और कागज़ कहाँ है?
जगाओ उस कवि को कि रैन न हो जाये,
इस महान काव्य के सुर कहीं न खो जायें,
जागो कवि, हे राष्ट्र के दिवाकर,
फैलाओ काव्य का परचम सर्वश्रेष्ठ बनकर।

-निधि सहगल

Wednesday, October 2, 2019

कजरौटा
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घनी कजियारी रात में आई,
वो काजल की डिबिया,
सब ने देख एक आह भरी,
कैसी है यह गुड़िया!
काजल नाम दिया माँ ने,
गोद में उठाकर,
बोली श्याम रूप है तो क्या,
नक्श तो मिले सजाकर,
किन्तु जग को कैसे भाती,
काजल की कजियारी,
नाम दे दिया उस मासूम को
कजरौटा मेरे भाई
बचपन से जवानी आयी,
पर न नाम यह छूटा,
कजरौटा सुनते सुनते उम्र का चक्कर बीता,
रो रो काजल माँ को कहती,
क्यों तुमने मुझे जन्म दिया है,
सबने मिलकर काजल को कजरौटा किया है।
माँ ने सदैव सिखाया बिटिया,
रंग रूप ढल जाए,
गुण कमाई ही सदा जग मे बाकी रह जाए।
काजल ने सबको अनसुना कर माँ की बात यह मानी,
खूब लगन से सभी परीक्षा अवल्ल दर्जे से उर्तीण की।
पढ़ लिख कर के काजल तो गाँव की मुखिया बनी।
कजरौटा न फिर किसी के मुंह की जुबान बनी।
गुण ही मानस की पहचान,
गुण ही शान कहाय,
रूप रंग तो उम्र का धोखा,
समय चले ढल जाए।

-निधि सहगल

Tuesday, October 1, 2019

प्रतीक्षा

एक रात्रि प्रतीक्षा आई,
प्रभु द्वार पर गुहार लगाई,
खोलो द्वार, हे नाथ जगत के,
क्यों है बुझे दीप सत्य के,
प्रभु ने सुनकर मर्म दुहाई,
प्रतिक्षा पर दया दिखाई,
बोले ," क्यों हो व्याकुल पुत्री,
किसने तुम्हारी दुविधा बढ़ाई?"
अश्रु भर नैनों में प्रतिक्षा,
बोली ,"नाथ करो अब रक्षा।
मानव को बना कर सर्वोत्तम,
दे कर उसे मस्तिष्क अति उत्तम
की आपने कैसी यह भूल!!
चुभा रहा वो सबको शूल।
मैं हूँ धैर्य की छोटी बहना,
मुझसे मानव का अब न लेना देना,
करने अपने स्वार्थ की पूर्ति,
हर क्षण है उसके मन में आपूर्ति,
बिना ऋतु के फल वो उगाए,
मेरे गुण को किंचित न अपनाए,
चाहे हो मन का व्यवहार या हो कोई
इच्छा अपार,
प्रतीक्षा का अर्थ न जाने,
धर्म अधर्म का भेद न माने,
कुछ तो करे आप हे प्रभुवर,
कर रहे ये जीवन को दूभर।"
सुनकर प्रतीक्षा की विपदा सारी,
बोले प्रभु ,न डरो तुम प्यारी,
मैंने जो ये प्रकृति रचाई,
निश्चित समय की रीति बनाई,
जो न इसका मान रखेगा,
स्वयं ही मुँह के बल वो गिरेगा।
धैर्य है तुम्हारी बहन ,लाडली,
उसने भी है गाँठ बांध ली
जो न उसकी कद्र करेगा,
प्रकृति संग जो अभद्र करेगा,
करेगी उसका वो विरोध,
मानव से लेगीं प्रतिशोध,
तुम्हें भी ये अधिकार प्राप्त है,
जन जीवन का सुधार प्राप्त है।
जाओ अपनी शक्ति दिखाओ,
जन को दुर्गुण को मुक्ति दिलाओ।

©निधि सहगल




छत की मुँडेर

मेरी छत की मुंडेर, चिड़ियों की वो टेर, इन वातानुकूलित डिब्बों में खो गई, बचपन के क़िस्सों संग अकेली ही सो गई, होली के बिखरे रंग फीके हैं पड़ गए...